तेज़ गेंदबाज़ी का नया व्याकरण - जसप्रीत बुमराह






अहमदाबाद की दोपहरें आम तौर पर धीमी चलती हैं। हवा में धूप का आलस होता है और गली-मोहल्लों में बच्चों की आवाज़ें। उन्हीं दोपहरों में एक दुबला-पतला लड़का था, जिसके हाथ में गेंद थी और सामने दीवार। गेंद दीवार से टकराती, वापस आती और वह फिर फेंकता। उस लड़के का नाम था जसप्रीत बुमराह। क्रिकेट की दुनिया तब तक नहीं जानती थी कि यह लड़का एक दिन गेंद को इतनी चुपचाप, इतनी सटीकता से फेंकेगा कि दुनिया के बड़े-बड़े बल्लेबाज़ों के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक जाएगी।


उसकी कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट की तरह शुरू नहीं होती। कोई बड़े मैदान, बड़ी अकादमी या बड़े संसाधन नहीं थे। अहमदाबाद के एक मध्यमवर्गीय घर में वह बड़ा हुआ, जहाँ पाँच साल की उम्र में पिता का साया उठ गया और घर की जिम्मेदारी माँ के कंधों पर आ गई। माँ स्कूल में पढ़ाती थीं, बाद में उसी स्कूल में प्रिंसिपल बनीं, और उसी स्कूल के मैदान में वह लड़का गेंद फेंकते-फेंकते बड़ा हुआ। घर में दौलत नहीं थी, लेकिन एक चीज़ भरपूर थी धैर्य। वही धैर्य बाद में उसकी गेंदों में उतर गया।

बचपन में गली क्रिकेट की रबर गेंद ने उसे एक अनोखा सबक दिया अगर गेंद फुल डालो तो बल्लेबाज़ डरता है, और अगर डरता है तो विकेट गिरता है। इसलिए उसने यॉर्कर को दोस्त बना लिया। वही यॉर्कर जो बाद में दुनिया की सबसे बड़ी बल्लेबाज़ी लाइनों को भी घुटनों पर ले आएगा।

स्कूल का नाम था निर्माण हाई स्कूल। वहीं से क्रिकेट का सपना आकार लेने लगा। कोचों ने उसकी गेंदबाज़ी देखी तो पहली प्रतिक्रिया यही थी यह एक अजीब-सा ऐक्शन है। छोटा रन-अप, अटपटी सी भुजा, और गेंद अचानक बिजली की तरह निकलती हुई। लेकिन क्रिकेट का इतिहास गवाह है जो चीज़ शुरू में अजीब लगती है, वही बाद में पहचान बन जाती है। वही हुआ। उस लड़के का वही अटपटा ऐक्शन धीरे-धीरे उसकी पहचान बन गया।

2013 की एक घरेलू टी-20 प्रतियोगिता में उसने गेंद फेंकी। सामने मुंबई की टीम थी। दर्शकों के लिए यह एक और मैच था, लेकिन स्टैंड में बैठे एक आदमी के लिए यह खोज का पल था। वह आदमी था न्यूज़ीलैंड का पूर्व खिलाड़ी और उस समय मुंबई इंडियंस का कोच John Wright। उन्होंने उस अजीब ऐक्शन वाले लड़के को देखा और पहचान लिया कि यह गेंदबाज़ अलग है। उसी साल वह आईपीएल में मुंबई इंडियंस की टीम में शामिल हुआ और यहीं से कहानी ने रफ्तार पकड़ ली।

फिर क्रिकेट ने देखा कि तेज़ गेंदबाज़ी सिर्फ गति का खेल नहीं होती, यह बुद्धि का भी खेल होती है। कुछ गेंदबाज़ गरजते हैं, कुछ चिल्लाते हैं, कुछ डराते हैं। लेकिन यह आदमी चुप रहता है। वह दौड़ता है, गेंद फेंकता है, और स्टंप बिखर जाते हैं। उसकी गेंदों में शोर नहीं होता, असर होता है।

भारतीय क्रिकेट में तेज़ गेंदबाज़ अक्सर तूफ़ान की तरह आते रहे कभी कपिल देव की स्विंग, कभी जवागल श्रीनाथ की रफ्तार, कभी ज़हीर ख़ान की चतुराई। लेकिन जसप्रीत बुमराह कुछ और निकला। वह किसी तूफ़ान की तरह नहीं आया। वह उस सुई की तरह आया जो चुपचाप कपड़े के आर-पार निकल जाती है और सिलाई पूरी कर देती है।

जब दुनिया टी-20 क्रिकेट को सिर्फ चौकों-छक्कों का खेल मानने लगी थी, तब उसने इस छोटे फॉर्मेट में गेंदबाज़ी की गरिमा वापस लाई। डेथ ओवरों में उसकी गेंदें ऐसे गिरती हैं जैसे कोई घड़ीसाज़ समय के सबसे छोटे पेंच कस रहा हो सटीक, ठंडी और निर्मम।

हाल के ICC Men's T20 World Cup में भी यही कहानी दोहराई गई। जब मैच की धड़कन तेज़ होती है और बल्लेबाज़ आख़िरी ओवरों में आसमान नापने लगते हैं, तब कप्तान की नज़र अक्सर एक ही आदमी को खोजती है। वह दौड़ता है, गेंद फेंकता है और अचानक शोर में सन्नाटा उतर आता है। यही उसकी असली ताक़त है वह मैच को चिल्लाकर नहीं जीतता, वह उसे धीरे-धीरे अपने कब्ज़े में ले लेता है।

कभी-कभी लगता है कि क्रिकेट के मैदान में कुछ खिलाड़ी सिर्फ खेलते नहीं, एक विचार बन जाते हैं। जसप्रीत बुमराह भी ऐसा ही एक विचार है यह विश्वास कि प्रतिभा को हमेशा परंपरागत साँचे में फिट होने की ज़रूरत नहीं। कभी-कभी अजीब ऐक्शन, छोटा रन-अप और चुप स्वभाव भी दुनिया की सबसे खतरनाक गेंदबाज़ी बना सकते हैं।

और शायद इसी वजह से जब वह रन-अप पर दौड़ता है, तो उसके पीछे सिर्फ एक गेंदबाज़ नहीं दौड़ता दौड़ता है अहमदाबाद का वह छोटा-सा घर, माँ की मेहनत, स्कूल का मैदान, गली की रबर गेंद और वह सपना जो किसी दिन दीवार से टकराकर वापस नहीं आया, सीधे दुनिया के सबसे बड़े मैदानों तक चला गया।

- सुधींद्र दि. देशपांडे

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